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ट्रैफिक पुलिस का पेड़ों के पीछे छिपना

प्रायः बड़े शहरों में यही देखने में आता है कि, “यातायात विभाग के जवान या अधिकारी सिंग्नल पर खड़े न रहकर सिंग्नल से कुछ दूरी पर छिपकर चालान करने के लिए ही खड़े रहते हैं !” क्या यातायात विभाग में प्रचलित यह व्यवस्था संवैधानिक है? क्या इस व्यवस्था से दुर्घटना होने की संभावना नहीं बढ़ जाती है? क्या देश के यातायात विभाग की इस व्यवस्था में बदलाव होना चाहियें या नहीं?  इसलिए आज का प्रश्न बनता है कि,

प्रश्न 12 : क्या ट्रैफिक पुलिस का पेड़ों के पीछे छिपना सही है?

प्रश्न से सहमत है तो क्या बदलाव होने चाहिए ? असहमत है तो क्यों ?

अपने विचार राष्ट्र व समाज में परिवर्तन के लिये सीमित शब्दों में निचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें या “सहमत और असहमत” के बटन को दबाकर अपना मत प्रकट करें ।

आशयः

प्रथमतः अपने प्रश्न को विस्तार देने के पूर्व ये लिखना चाहूंगा कि, हमारे समाज में यातायात विभाग ने बहुत से प्रशंसनीय व अतुल्नीय कार्य के उदाहरण स्थापित किए हैं । उनकी उसी प्रशंसनीय व अतुल्नीय छवि को “झाड़ की आड़” वाली व्यवस्था प्रश्नीय बना रही है ।

सामान्यतः हमें यही देखने में आता है कि जब यातायात सिंग्नल पर यातायात विभाग का जवान या अधिकारी मौजूद रहते है तो लोग यातायात नियमों का पालन करते हुए दिखते है । जब यातायात सिंग्नल पर कोई भी वर्दीधारी उपस्थित नहीं रहता है, तब लोग नियमों का उल्लंघन करते हैं । इससे स्पष्ट है कि अगर सिंग्नल पर कोई भी वर्दीधारी जवान उपस्थित रहता है तो लोग नियमों का पालन करते ही हैं ।

जब हम ये दृश्य देखते है कि वर्दीधारी जवान या अधिकारी सिंग्नल पर उपस्थित न रहकर उससे थोड़ा आगे किसी झाड़ या गाड़ी की आड़ में 3-4 की संख्या में छिपे खड़े है और नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड़ित कर रहे हैं । तब यातायात विभाग की इस व्यवस्था पर ये विचारणीय प्रश्न बनता है कि, क्या यातायात विभाग में प्रचलित ये व्यवस्था संवैधानिक है?

अगर वर्दीधारी अपने सिग्नल पर उपस्थित रहकर यातायात व्यवस्था का संचालन करें तो लोग नियमों का उल्लंघन कैंसे करेंगे? नियमों का उल्लंघन वर्दीधारी की अनुपस्थिती में ही होता है । अधिकांशतः वाहन चालक के स्मरण में ये बात बनी ही रहती है कि उनके सिंग्नल या चौराहे पर कोई जवान तो तैनात नहीं होगा । वे इस मौके का फायदा लेते हुए असंयमित रूप से वाहन चलाते है व दुर्घटना को जन्म देते है । इस तरह की दुर्घटना के कारण समाज के कई बेकसूर परिवार को जीवन भर दुःखों का सामना करना पड़ता है । इसीलिए, यातायात विभाग की “झाड की आड़” में खड़ें रहकर संयुक्त रूप से चालान बनाने वाली प्रक्रिया पर ज्वलंत प्रश्न उत्पन्न होते है ।

  1. जिस सिंग्नल पर एक वर्दीधारी कर्मचारी से काम चल सकता है और लोग नियमों का पालन कर सकते है, वहां 3 से 4 लोग की टीम “झाड़ की आड़” में क्यों?
  2. एक तरफ ये विभाग अपने पास कर्मचारियों की कमी बताते हुए सरकार से और कर्मचारी बढ़ाने की मांग कर रहा है और दूसरी तरफ एकत्रित होकर चालान बना रहा हैं, क्यों?
  3. नियमित रूप से टीम बनाकर ही चालान बनाना कितना संवैधानिक हैं? दस्तावेजों की जांच करने के लिए टीम जायज हो सकती है, लेकिन सिंग्नल पर अनुपस्थित रहकर सिंग्नल तोड़ने वालों के लिये टीम…?
  4. एक वर्दीधारी अपने सिग्नल पर उपस्थित रहकर यातायात व्यवस्था का संचालन करें तो चार वर्दीधारी चार सिंग्नल को संभाल सकते हैं । चारों सिंग्नल पर वर्दीधारी की उपस्थिती से मार्ग में अनुशासित यातायात के संचालन रहने की उम्मीद बढ़ जाती है ।
  5. जब वाहन चालक के स्मरण में सदैव ये बात विद्यमान रहेगी कि सिंग्नल पर कोई ना कोई अधिकारी या जवान मौजूद होगा तो कोई भी वाहन चालक असंयमित वाहन नहीं चलायेगा, इससे रोड पर दुर्घटनाओं में कमी आ सकती है ।
  6. समाज ने जिस यातायात विभाग को मार्ग पर नियमों का पालन करवाने का दायित्व सौंपा है, वो क्यों छिपकर चालान काटने की व्यवस्था में मशगूल हैं? सोचना हैं हमें …. लिखना है हमें … बदलवाना है हमें … ।

यातायात विभाग के लिए “झाड़ की आड़” से चालान द्वारा प्राप्त होने वाली आमदानी सही व्यवस्था हो सकती है । सामाजिक रूप से यह व्यवस्था सही प्रतीत नहीं लगती हैं, क्योंकि सिंग्नल पर वर्दीधारी की अनुपस्थिती से जनहानि होने की संभावना बढ़ जाती है जो उनकी आमदानी की तुलना में बेहद ….. दर्दनीय हैं । इसीलिए समाज में आज यह व्यवस्था प्रश्नीय बनी है ।

हमारे देश में जब भी यातायात विभाग के लिए नियम व कायदे बने होंगे तो “झाड़ की आड़” में छिपकर खड़े रहकर चालान बनाने वाला नियम शायद ही बना होगा । संभवतः समय ने “झाड़ की आड़” वाली व्यवस्था को जन्म दिया है । अब ये व्यवस्था प्रायः ही देखने को मिल जाती है । समाज में यातायात विभाग का जन्म इस विचार के साथ भी हुआ होगा कि “ये विभाग मार्ग में बढ़ती वाहनों की संख्या से दुर्घटना एवं जनहानि को कम से कम होने दे, ना कि चालान बनाकर पैसा अर्जित करें” । अतः समाज के लिए तो यही अच्छा होगा कि जवान या अधिकारी चैराहे के मध्य में नियमित उपस्थित रहकर अपनी ड्यूटी को अंजाम दे, जिनके भय से सभी वाहन चालक नियमों का पालन करें और किसी भी परिवार की जान माल का नुकसान न हो । जय हिन्द … जय भारत !!

पाठकों से निवेदन –

इस विषय पर आपका विचार या सुझाव परिवर्तन के लिए सार्थक हो सकता है । आप अपने विचार या सुझाव इस ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें या अपना मत दे । आपके विचार/सुझाव सीधे देश के सर्वोत्तम पदों पर आसीन महानुभावों को प्रेषित हैं । आपके बहुमूल्य विचार/सुझाव पर हो सकता है सरकार अमल करते हुए कार्यान्वित करें । आप इसी उम्मीद के साथ अपने विचार रखें । धन्यवाद ।

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Atharva

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